Highlights
- संसद के आखिरी चार दिनों में सरकार के बड़े फैसले पर सबकी नजरें टिकीं।
- महिला आरक्षण और परिसीमन बिल को लेकर विपक्ष और सरकार आमने-सामने।
- FCRA बिल पर सियासत तेज, विदेशी फंडिंग को लेकर उठे कई सवाल।
नई दिल्ली: इंडिया टीवी के कार्यक्रम कॉफी पर कुरुक्षेत्र में एंकर सौरव शर्मा ने वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री, राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी और इंडिया टीवी के पॉलिटिकल एडिटर देवेंद्र पाराशर के साथ संसद के मौजूदा माहौल पर विस्तार से चर्चा की। चर्चा में बताया गया कि संसद के 2 हफ्ते हंगामे में निकल जाने के बाद अब आखिरी 4 दिन बेहद अहम हो गए हैं। सवाल यह है कि क्या सरकार अपने बड़े एजेंडे को आगे बढ़ा पाएगी या विपक्ष की रणनीति के कारण गतिरोध जारी रहेगा।
कांग्रेस ने अपने सांसदों को जारी किया व्हिप
चर्चा में कहा गया कि संसद का सत्र पहले से ही काफी हंगामेदार रहा है और कामकाज प्रभावित हुआ है। विपक्ष लगातार गृह मंत्री के सदन में बयान की मांग कर रहा है, जबकि सरकार का कहना है कि विपक्ष जानबूझकर सदन नहीं चलने दे रहा। कांग्रेस ने अपने सांसदों को व्हिप जारी कर 10, 11 और 12 अगस्त को सदन में मौजूद रहने को कहा है। इससे राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई कि सरकार किसी बड़े कदम की तैयारी कर सकती है। हालांकि अभी तक सरकार की ओर से कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिया गया है।
महिला आरक्षण और परिसीमन बिल आएंगे?
महिला आरक्षण और परिसीमन बिल को लेकर चर्चा में कहा गया कि फिलहाल इनके आने की संभावना कम दिखाई दे रही है। सरकार के पास संख्या बल होने की बात कही जा रही है, लेकिन सरकार यह संदेश नहीं देना चाहती कि बिना पर्याप्त चर्चा के इतना बड़ा संवैधानिक बदलाव कर दिया गया। चर्चा में बताया गया कि परिसीमन का मुद्दा दक्षिणी राज्यों की चिंता से जुड़ा है, क्योंकि उन्हें डर है कि आबादी के आधार पर सीटों के पुनर्गठन से उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है। हालांकि यह भी कहा गया कि पूरे दक्षिण भारत का विरोध नहीं है और कई दल इस पर सहमत हो सकते हैं।
FCRA बिल पर सरकार ज्यादा सक्रिय
FCRA यानी विदेशी अंशदान विनियमन कानून में बदलाव को लेकर सरकार ज्यादा सक्रिय दिखाई दे रही है। चर्चा में बताया गया कि विदेशी फंडिंग से जुड़े नियमों को लेकर सरकार का तर्क है कि देश की सुरक्षा और पारदर्शिता के लिए नियंत्रण जरूरी है। वहीं विपक्ष और कई संगठनों की चिंता है कि नए प्रावधानों से गैर सरकारी संस्थाओं और सामाजिक संगठनों पर असर पड़ सकता है। कार्यक्रम में यह भी कहा गया कि इस मुद्दे को दोनों पक्ष अलग-अलग नजरिए से पेश कर रहे हैं, जिससे राजनीतिक बहस और तेज हो गई है।
सत्ता पक्ष और विपक्ष में भरोसे की कमी
संसद में लगातार बढ़ती तल्खी पर चर्चा करते हुए कहा गया कि पहले भी सदन में गतिरोध होता था, लेकिन नेताओं के बीच व्यक्तिगत संवाद बना रहता था। अब सत्ता पक्ष और विपक्ष के शीर्ष नेताओं के बीच सीधा संवाद कम दिखाई देता है। यही वजह है कि भरोसे की कमी बढ़ती जा रही है। चर्चा में यह भी कहा गया कि सरकार और विपक्ष दोनों अपनी-अपनी राजनीतिक बढ़त बनाने की कोशिश कर रहे हैं। विपक्ष चाहता है कि सरकार जवाब दे, जबकि सरकार विपक्ष पर सदन बाधित करने का आरोप लगा रही है।
सरकार को लग सकता है सियासी झटका?
आखिरी दिनों को लेकर चर्चा में कहा गया कि अगर सरकार अपने एजेंडे के कुछ हिस्सों को पूरा नहीं कर पाती है तो यह उसके लिए राजनीतिक झटका हो सकता है। हालांकि संसद में ऐसा गतिरोध पहले भी देखा गया है। विशेषज्ञों ने कहा कि लोकतंत्र में सरकार और विपक्ष दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण है और बातचीत से ही समाधान निकल सकता है। अब सबकी नजरें इस बात पर हैं कि आने वाले दिनों में सरकार कौन सा कदम उठाती है और क्या संसद का माहौल किसी सहमति की ओर बढ़ता है।
डिटेल में पूरी चर्चा देखने के लिए सबसे ऊपर दिए गए वीडियो पर क्लिक करें।
(डिस्क्लेमरः यह आर्टिकल कार्यक्रम में हुई चर्चा पर आधारित है और कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए गए विचार मेहमानों के निजी विचार हैं।)